`MERCURIAL' MEHBOOBA

जी तो करता है की तुम्हें लपक के चूम लूं
मदहोशी के खुमार में कुछ पल तो झूम लूं
पर डरता हूँ,
नहीं, नहीं,
थप्पड़ से नहीं,
प्यार से भी नहीं,
Anti-Rape Law के नए प्रावधानों से भी नहीं,
न ही तेजपाल के हश्र से

जो चीज़ मुझे तुम्हें चूमने से रोकती है,
पल पल मुझे टोकती है,
वो है पंगु हो के मरने का डर,
तुम्हारी चमकती-दमकती मरमरी त्वचा में बहता बस ज़हर,


में हूँ डरता न प्यार से, न उसके इज़हार से,
पर नहीं मुझे शौक निगलने का Mercury,
अस्पताल में शरीर से Chromium भगाने के लिए लेटे रह कर,
नहीं करानी अपनी किरकिरी,
छोटी छोटी रंगीन शीशियों और ट्यूबों से निकाल,
अपने चेहरे और गर्दन पे जो विष रोज़ मलती हो तुम,
सांवले होने की ग्लानि में कैसे गलती हो तुम  

मुबारक हो तुम्हें तुम्हारा गोरापन,
अपनी त्वचा के कुदरती रंग पे जब आये शर्म,
जाने कैसा है ये छिछोरापन,
अपने रंग पे जिसका ह्रदय महसूस करे हीन,
गोरा दिखने की चाहत में जो हो अन्दर से ग़मगीन,
उस से भला कैसा रिश्ता बनेगा प्यार का महीन,
कुर्बान होने को तैयार हूँ प्यार के लिए
नहीं ज़हर से पुती दीवार के लिए.

`Fair Skin' Freakness

Popular posts from this blog

A Tree & a Bonsai

An Untold Story of Love Jihad